हरिद्वार।
केंद्र सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 से चार मजदूर संहिताओं (Labour Codes) को पूर्ण रूप से लागू करने के खिलाफ इंकलाबी मजदूर केंद्र और संयुक्त संघर्षशील ट्रेड यूनियन मोर्चा ने आज चिन्मय डिग्री कॉलेज चौराहे पर विरोध सभा आयोजित की। आयोजकों ने इस दिन को काला दिवस (Black Day) के रूप में मनाया।
सभा में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर लाए गए चार नए श्रम कोड (Code on Wages, Industrial Relations Code, Code on Social Security और Occupational Safety, Health and Working Conditions Code) मजदूरों के अधिकारों पर हमला हैं। इनके जरिए पूंजीपतियों को छंटनी, तालाबंदी और ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर आसानी से नियंत्रण की छूट दी गई है।
इंकलाबी मजदूर केंद्र के जय प्रकाश ने कहा, “मोदी सरकार ने 21 नवंबर 2025 से इन संहिताओं को अधिसूचित कर दिया था। आज नियमावली लागू करके इन्हें व्यवहार में ला दिया गया है। ये कानून मजदूरों के जीवन को 100-150 साल पीछे ले जाने वाले हैं।”
एवरेडी मजदूर यूनियन के महामंत्री अनिल कुमार ने बताया कि 300 से कम मजदूरों वाली इकाइयों में आसानी से छंटनी और तालाबंदी की जा सकेगी। ट्रेड यूनियन बनाने और हड़ताल करने की प्रक्रिया को भी जटिल बना दिया गया है।
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की प्रभारी नीता ने महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “इन संहिताओं में महिलाओं को रात की पाली और भारी उद्योगों में काम करने की अनुमति दी गई है। इससे उनके स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन और बच्चों की देखभाल पर बुरा असर पड़ेगा तथा महिला हिंसा और यौन अपराध बढ़ सकते हैं।”
भेल मजदूर ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष राजकिशोर ने कहा कि संगठित के साथ-साथ असंगठित मजदूरों पर भी यह जबरदस्त हमला है। कंपनी एक्ट के तहत मजदूर और कारखाने की परिभाषा बदल दी गई है।
फूड्स श्रमिक यूनियन (आईटीसी) के गोविंद ने आरोप लगाया कि प्रशिक्षुओं (ट्रेनी), फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयी (FTE), नीम और नेप्स पर काम करने वालों को मजदूर की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है, जिससे वे श्रम कानूनों से पूरी तरह बाहर हो गए हैं।
कर्मचारी संघ सत्यम आटो के महिपाल, किर्बी श्रमिक कमेटी के बाजीद और सिमेंस वर्कर्स यूनियन (सी एंड एस) के महिपाल ने भी संहिताओं को मजदूर विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि ये कानून सीधे कारपोरेट पूंजीपतियों के हित साधने के लिए लाए गए हैं, जो मजदूरों को कंगाल बनाने का काम करेंगे।
वक्ताओं ने एकजुट संघर्ष की अपील की और कहा कि देशव्यापी विरोध से ही इन “काले कानूनों” को रोका जा सकता है।
सभा में शामिल संगठनो में इंकलाबी मजदूर केंद्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन, फूड्स श्रमिक यूनियन (आईटीसी), देवभूमि श्रमिक संगठन (एचयूएल), एवरेडी मजदूर यूनियन, किर्बी श्रमिक कमेटी, सिमेंस वर्कर्स यूनियन (सी एंड एस), कर्मचारी संघ सत्यम आटो, जन अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे।
आयोजकों ने बताया कि मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के तहत पूरे देश में आज का दिन काला दिवस के रूप में मनाया गया।
केंद्र सरकार का कहना है कि चार श्रम संहिताएं 29 पुराने कानूनों को समेकित करके श्रम व्यवस्था को सरल, आधुनिक और मजदूरों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाली हैं।
वहीं ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि इससे मजदूर अधिकार कमजोर होंगे।



















































