हरिद्वार।
धर्मनगरी में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषणा को लेकर संतो ने बार बार एक जुटता दिखाने का कार्य किया है, बीते दिन भी कई सन्तो ने गौ माता को लेकर बड़े बड़े बयान जारी किए है, लेकिन धरातल पर यही संत गौ वंशियो को देख कर भो अनदेखा कर देते है। बस कुछ जनुनी युवा ही तन मन से सेवा में जुटे है। वही बात करे पशु चिकित्सा विभाग की तो इसके चिकित्सको को इन आवारा पशुओं से कोई सरोकार ही नही है, ये केवल अपने कार्यालयों में बैठ कर उन्ही पशुओं का इलाज करते है जो इनके पास आते है या कोई व्यक्ति इन्हें अपने डेरियों या घरों में बुलाये, जहां से इन्हें खासी फीस भी मिल जाती है। जबकि सरकार ने इन्हें सचल दस्ते के लिए वाहन भी उपलब्ध कराए हुए है, यदि इनके सचल दस्ते को बुलाने के लिए कॉल भी किया जाता है तो सचल दस्ता शायद हल्द्वानी या पौड़ी गढ़वाल से आता होगा, उसको मोके पर पहुचने में कई घण्टे या अगला दिन तक लग जाता है। ऐसे में पशु प्रेमी भी ठगा रह जाता है। उसको घायल पशु के इलाज के लिए या तो प्राइवेट डॉक्टर को बुलाना पड़ता है या फिर घायल बे जुबान दम तोड़ देता है। जबकि कई विभाग में डाक्टर की कोई कमी नही है।
शंकर आश्रम के निकट रहने वाली एक महिला ने बताया कि कुछ महीने पहले एक डॉग को किसी ने बुरी तरह पीटा था जिसमे उसकी एक आंख फूट गयी थी और उसका खून बहुत तेजी से बह रहा था, जब पशु चिकित्सा विभाग की हेल्पलाइन पर सम्पर्क किया गया तो उन्होंने आधा घंटे मे पहुचने की बात कही, लेकिन शाम 4 बजे से रात हो गयी लेकिन सचल दस्ता नही पहुचा बार बार संपर्क करने के बावजूद भी बे जुबान को सरकारी मदद नही मिल पाई। रात को 10 बजे एक प्राइवेट डॉक्टर से संपर्क किया और 1000 रुपए फीस देकर लावारिस बेजुबान का इलाज कराया, अगले दिन दोपहर में सचल दस्ते से काल आया के कहाँ आना है,,













































