घायल बेजुबानों को समय पर नहीं मिल रही सरकारी मदद, पशु चिकित्सा विभाग पर उठे सवाल
हरिद्वार।
धर्मनगरी हरिद्वार में गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर संत समाज समय-समय पर एकजुट होकर आवाज उठाता रहा है। हाल ही में भी कई संतों ने गौ संरक्षण और गौ माता के सम्मान को लेकर बड़े बयान दिए। लेकिन दूसरी ओर, शहर की सड़कों पर घायल और बीमार घूम रहे गौवंश तथा अन्य बेसहारा पशुओं की स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि गौ सेवा के नाम पर बड़े-बड़े दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जब सड़क पर कोई घायल गौवंश या अन्य बेजुबान पशु तड़पता है तो उसकी मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आते हैं। ऐसे में कुछ पशु प्रेमी और युवा ही अपने स्तर पर इनकी सेवा और उपचार का प्रयास कर रहे हैं।
वहीं पशु चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि विभाग के चिकित्सक मुख्य रूप से कार्यालय या निजी डेयरियों और घरों में बुलाए जाने वाले पशुओं का उपचार करते हैं, जबकि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए सचल पशु चिकित्सा वाहनों का लाभ सड़क पर घायल आवारा पशुओं को समय पर नहीं मिल पाता। आरोप है कि हेल्पलाइन पर सूचना देने के बावजूद सचल दस्ता कई घंटे या अगले दिन तक मौके पर नहीं पहुंचता, जिससे घायल पशुओं की जान पर बन आती है।
महिला ने सुनाई दर्दनाक घटना
शंकर आश्रम के पास रहने वाली एक महिला ने बताया कि कुछ महीने पहले एक आवारा कुत्ते को किसी ने बेरहमी से पीट दिया था, जिससे उसकी एक आंख फूट गई और लगातार खून बह रहा था। महिला के अनुसार उन्होंने तत्काल पशु चिकित्सा विभाग की हेल्पलाइन पर संपर्क किया, जहां से आधे घंटे में टीम पहुंचने का आश्वासन दिया गया। लेकिन शाम चार बजे से रात होने तक कोई भी नहीं पहुंचा। कई बार फोन करने के बावजूद सरकारी सहायता नहीं मिली।
आखिरकार रात करीब 10 बजे एक निजी पशु चिकित्सक को बुलाना पड़ा, जिसने ₹1000 शुल्क लेकर घायल बेजुबान का उपचार किया। महिला का कहना है कि विभाग की टीम का फोन अगले दिन दोपहर में आया और पूछा गया कि उन्हें कहां आना है। इस घटना ने विभाग की आपातकालीन सेवा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार ने सचल पशु चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराई है तो उसका लाभ समय पर सड़क पर घायल और बेसहारा पशुओं तक भी पहुंचना चाहिए, ताकि किसी बेजुबान की जान इलाज के अभाव में न जाए।




















































