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हरिद्वार की सड़कों पर कांग्रेस की गुटबाजी ने खोली कलह की पोल

क्या हरीश रावत गुट को अलग-थलग करने की रणनीति अब जमीन पर दिखाई देने लगी है?

 उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से चली आ रही अंदरूनी खींचतान अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। बुधवार को हरिद्वार में कांग्रेस की ओर से निकाली गई ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ यात्रा के दौरान जिस तरह पार्टी के ही नेता और समर्थक आपस में भिड़े, उसने प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। यात्रा का उद्देश्य भले ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर केंद्र और निर्वाचन आयोग के खिलाफ आवाज उठाना था, लेकिन हरिद्वार की सड़कों पर कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान ही सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश बन गई।

राजनीतिक हलकों में इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ दो नेताओं के बीच हुआ विवाद नहीं माना जा रहा है। इसे कांग्रेस के भीतर चल रहे गुटीय शक्ति संघर्ष से जोड़कर देखा जा रहा है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की लगातार सक्रियता और उनके समर्थकों का अपना राजनीतिक प्रभाव है, तो दूसरी तरफ प्रदेश संगठन और कांग्रेस हाईकमान सामूहिक नेतृत्व तथा पार्टी अनुशासन पर जोर देता दिखाई दे रहा है।

काजी की पीठ थपथपाने से लेकर सड़क पर टकराव

हरिद्वार की घटना में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि एक ओर कांग्रेस नेतृत्व द्वारा काजी निजामुद्दीन जैसे नेताओं को संगठन में महत्व मिलता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर हरीश रावत समर्थक खेमे से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया।

बुधवार की यात्रा के दौरान शिवमूर्ति चौक के पास कांग्रेस नेताओं के समर्थकों में कहासुनी हुई और देखते ही देखते मामला हाथापाई तक पहुंच गया। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद में गुरजीत लहरी और जितेंद्र पंवार से जुड़े समर्थक आमने-सामने आए। वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ, जिसमें मारपीट और अफरातफरी का दृश्य दिखाई दिया।

यह घटना उस समय हुई जब कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ता ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ मार्च निकाल रहे थे। यानी जिस मंच से कांग्रेस को केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के खिलाफ एकजुटता का संदेश देना था, वहीं पार्टी की अंदरूनी लड़ाई सड़क पर दिखाई देने लगी।

क्या रावत खेमे को किया जा रहा किनारे ?

यही सवाल अब उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े और पुराने चेहरों में गिने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर उनके स्वतंत्र राजनीतिक कार्यक्रमों और सक्रियता को लेकर हाईकमान की असहजता सामने आती रही है। हाल ही में रावत ने अपनी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ शुरू की थी। इस घटनाक्रम को कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर बढ़ते मतभेद के संकेत के रूप में देखा गया।

इसके बाद हाईकमान की ओर से सामूहिक कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने और अलग-अलग व्यक्तिगत अभियानों से बचने का संदेश सामने आया। यानी कांग्रेस नेतृत्व का जोर साफ तौर पर यह दिखाने पर है कि आने वाला चुनाव किसी एक नेता के चेहरे या गुट के भरोसे नहीं, बल्कि संगठन की सामूहिक ताकत से लड़ा जाए।

ऐसे में हरिद्वार की सड़क पर हुआ विवाद महज एक स्थानीय झड़प नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही बड़ी राजनीतिक कहानी का छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण दृश्य माना जा सकता है।

हरिद्वार उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। यहां कांग्रेस के भीतर कई प्रभावशाली नेता और उनके समर्थक अपने-अपने राजनीतिक आधार के साथ सक्रिय रहे हैं। ऐसे में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हरिद्वार में पार्टी का शक्ति संतुलन अपने आप में बड़ा मुद्दा बन गया है।

दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ ही दिन पहले हरीश रावत ने हरिद्वार में अपनी सक्रियता बढ़ाई थी और उनकी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर चर्चाएं तेज हुई थीं। 

ऐसे समय में प्रदेश प्रभारी के नेतृत्व में आयोजित बड़े कार्यक्रम से हरीश रावत की गैरमौजूदगी और उसी कार्यक्रम के दौरान उनके समर्थक माने जाने वाले नेताओं से जुड़ा विवाद कई सवाल खड़े करता है।

कांग्रेस लगातार भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दे उठा रही है। SIR, बेरोजगारी, महंगाई और जनहित के सवालों को लेकर पार्टी सड़क पर उतर रही है। लेकिन जब पार्टी का अपना ही मंच गुटबाजी का अखाड़ा बन जाए तो विपक्ष के लिए राजनीतिक संदेश कमजोर पड़ सकता है।

बुधवार की घटना ने यही सवाल खड़ा किया है कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा से मुकाबला करने के लिए तैयार हो रही है या पहले अपने ही घर की लड़ाई सुलझाने में उलझी हुई है?

सड़क पर हुई मारपीट ने कांग्रेस के विरोधियों को हमला करने का मौका जरूर दे दिया है, लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल कांग्रेस के भीतर का है—क्या पार्टी सभी वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थकों को साथ लेकर चल पाएगी?

उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से नेतृत्व को लेकर पहले से अलग-अलग ध्रुव दिखाई देते रहे हैं। हरीश रावत का अपना जनाधार और राजनीतिक प्रभाव है, जबकि वर्तमान प्रदेश संगठन अपनी अलग राजनीतिक संरचना के साथ आगे बढ़ रहा है।

ऐसे में बुधवार की घटना को यदि व्यापक राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो यह केवल दो कार्यकर्ताओं की लड़ाई नहीं लगती। यह उस तनाव की अभिव्यक्ति भी हो सकती है जो कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के बीच लगातार बढ़ रहा है।

हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से हरीश रावत गुट को अलग-थलग करने का फैसला कर लिया है। लेकिन घटनाक्रमों को जोड़कर देखें तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि कांग्रेस हाईकमान अब किसी एक गुट के दबदबे के बजाय संगठनात्मक नियंत्रण और सामूहिक नेतृत्व को प्राथमिकता देता दिखाई दे रहा है।

और हरिद्वार की सड़क पर हुआ विवाद इसी बदलते राजनीतिक समीकरण की सबसे खुली तस्वीर बनकर सामने आया है।

अब सवाल यह है कि बुधवार को सड़क पर चले लात-घूंसे सिर्फ कार्यकर्ताओं के बीच का गुस्सा था, या उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों की पहली खुली झलक?

आगामी दिनों में कांग्रेस नेतृत्व इस घटना पर क्या कार्रवाई करता है यही तय करेगा कि हरिद्वार की यह घटना महज एक दिन का विवाद थी या 2027 से पहले कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।

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