4 सितंबर को राधास्वामी मत के आद्य प्रवर्तक परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज का पावन भंडारा
2 से 6 सितंबर तक भंडारा सप्ताह, देश-विदेश की विभिन्न शाखाओं से सतसंगी भाई-बहनों और पंजीकृत जिज्ञासुओं का दयालबाग पहुंचना आरंभ
आगरा। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर शुक्रवार 4 सितंबर 2026 को दयालबाग में राधास्वामी मत के आद्य प्रवर्तक, संस्थापक एवं प्रथम संत सतगुरु परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज का पावन भंडारा परम श्रद्धा, प्रेम, सेवा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दयालबाग में 2 से 6 सितंबर तक भंडारा सप्ताह मनाया जाएगा। 4 सितंबर को भारत और विदेशों की विभिन्न शाखाओं में भी पावन भंडारा श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जाएगा।
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और देश के पूर्वी राज्यों के साथ यूरोप की अनुमत शाखाओं से सतसंगी भाई-बहनों और पंजीकृत जिज्ञासुओं का दयालबाग आगमन आरंभ हो चुका है। भंडारा दिवस पर प्रातःकाल आरती का पावन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। द्वितीय पाली में खेतों पर नियमानुसार परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज का पावन भंडारा मनाया जाएगा।
मानव-मात्र के उद्धार के लिए नर-देह धारण कर धरा पर किया अवतरण
परम दयालु राधास्वामी दयाल की असीम मौज, दया, मेहर और करुणा से मानव-मात्र के उद्धार तथा निज घर प्रदान करने के लिए स्वयं नर-देह धारण कर धरा पर अवतरित होने की मौज फरमाने वाले परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज राधास्वामी मत के आद्य प्रवर्तक, संस्थापक एवं प्रथम संत सतगुरु हैं।
दयालबाग सतसंग की आध्यात्मिक परंपरा में परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज को राधास्वामी दयाल के अवतार तथा सार्वजनिक राधास्वामी सतसंग के आद्य प्रवर्तक ने जीवात्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराया और सुरत-शब्द-योग के माध्यम से परम धाम तक पहुंचने का सहज, व्यावहारिक एवं अनुभूतिजन्य मार्ग प्रकट किया।
उनके प्रति सतसंग की श्रद्धा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया गया है—
“परम पुरुष पूरन धनी, राधास्वामी नाम।
तिनके चरण पदम पर, कोटि-कोटि प्रणाम॥”
जन्माष्टमी की पावन रात्रि हुआ अवतरण
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज का सांसारिक नाम सेठ शिवदयाल सिंह था। सतसंग साहित्य और परंपरा के अनुसार उनका अवतरण जन्माष्टमी की पावन रात्रि 24 और 25 अगस्त 1818 के मध्य आगरा की पन्नी गली में हुआ। उनके अवतरण को परम दयाल राधास्वामी दयाल की उस असीम दया का प्रकटीकरण माना जाता है, जिसके माध्यम से काल और माया के बंधनों में आबद्ध जीवों के लिए अंतरमुखी आध्यात्मिक साधना और परम धाम की प्राप्ति का मार्ग पुनः सुलभ हुआ।
बाल्यकाल से ही उनमें असाधारण आध्यात्मिक गंभीरता, करुणा और अंतरमुखी प्रवृत्ति प्रकट होने लगी थी। लगभग छह वर्ष की अवस्था से ही वे गहन आध्यात्मिक अभ्यास में प्रवृत्त हो गए थे। हिंदी, उर्दू, फारसी और गुरुमुखी के साथ उन्हें संस्कृत तथा अरबी का भी ज्ञान था। सांसारिक प्रतिष्ठा, वैभव और उपलब्धियों से निरपेक्ष रहते हुए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जीवों के उद्धार, आध्यात्मिक साधना और सच्चे परमार्थ के मार्ग को प्रकट करने में समर्पित कर दिया।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत तेजस्वी, शांत, प्रेममय और करुणामय था। अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को भी वे सहज और सरल भाषा में समझाते थे, जिससे विद्वान से लेकर सामान्य जिज्ञासु तक उनके बचनों को हृदयंगम कर सकता था। उनके दर्शन, बचनों और सतसंग में ऐसी आत्मिक शांति और आकर्षण अनुभव किया जाता था कि उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति भीतर से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।
पन्नी गली से दयालबाग तक जुड़ी आध्यात्मिक स्मृतियां
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज के पन्नी गली स्थित निवास पर आरंभिक काल में साधु-संत, आध्यात्मिक जिज्ञासु और निकटस्थ प्रेमी एकत्र होकर उनसे आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते और अंतरमुखी साधना का मार्ग समझते थे। धीरे-धीरे पन्नी गली प्रेम, भक्ति, सतसंग, सुमिरन, ध्यान और भजन की अनुपम आध्यात्मिक स्थली बन गई।
सतसंग की श्रद्धापूर्ण परंपरा में उस समय की पन्नी गली के वातावरण का वर्णन अत्यंत भावपूर्ण ढंग से किया जाता है। कहा जाता है कि वहां सतसंग और शब्द की ऐसी दिव्य गूंज रहती थी कि उस गली से होकर निकलने वाला व्यक्ति भी वहां की पावन आध्यात्मिक तरंगों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था। साधु-संत, गृहस्थ, विद्वान और सामान्य जिज्ञासु उनके दर्शन और सहज बचनों में ऐसी आत्मिक शांति अनुभव करते थे, जो उन्हें बार-बार सतसंग की ओर आकर्षित करती थी।
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज पन्नी गली से आगरा नगर के बाहरी क्षेत्रों और यमुना तट की दिशा में भ्रमण के लिए भी जाया करते थे। सतसंग की परंपरागत स्मृतियों में वर्णित है कि उन्होंने वर्तमान दयालबाग और उसके आसपास के भूभाग की ओर संकेत करते हुए फरमाया था कि भविष्य में यहां सतसंगियों की एक बड़ी जमात निवास करेगी। आज दयालबाग तथा उसके आसपास विकसित विशाल सतसंगी समुदाय में संगत उनके उस पावन और दूरदर्शी संकेत का साकार रूप श्रद्धापूर्वक देखती है।
“पन्नी गली से हुआ तुलू, सच्चे खुदा का आफताब…”
1861 में आम जिज्ञासुओं और गृहस्थों के लिए खुले सतसंग के द्वार
वर्ष 1858 में राय सालिगराम साहब बहादुर जो आगे चलकर परम गुरु हुजूर महाराज के रूप में विख्यात हुए, परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज के सान्निध्य में आए। उन्होंने हुजूर स्वामीजी महाराज की परम आध्यात्मिक महत्ता को पहचाना और पूर्ण दीनता, प्रेम एवं समर्पण के साथ उनके पावन चरणों की शरण ग्रहण की।
उस समय तक आध्यात्मिक उपदेश मुख्यतः चुनिंदा साधु-संतों, निकटस्थ प्रेमियों और गंभीर जिज्ञासुओं को प्रदान किया जाता था। परम गुरु हुजूर महाराज के अत्यंत विनम्र और बार-बार किए गए निवेदन पर परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज ने बसंत पंचमी, 15 फरवरी 1861 को सामान्य जिज्ञासुओं और गृहस्थों के लिए सतसंग के द्वार खोल दिए। यह दिन राधास्वामी सतसंग के सार्वजनिक शुभारंभ और मानव-इतिहास में परम दया के अनुपम प्रकटीकरण के रूप में स्मरण किया जाता है।
“राधास्वामी धरा नर रूप जगत में, गुरु होय जीव चिताए।
जिन-जिन माना बचन समझ के, तिनको संग लगाए॥”
स्वामीजी महाराज ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए आत्मिक उन्नति का सहज मार्ग प्रदान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आध्यात्मिक प्रगति के लिए परिवार, समाज, नौकरी अथवा व्यवसाय का त्याग आवश्यक नहीं है। मनुष्य अपने सांसारिक दायित्वों को ईमानदारी से निभाते हुए, मेहनत और सत्यनिष्ठा से आजीविका अर्जित करके, संयमित और सदाचारी जीवन जीते हुए तथा नियमित सुमिरन, ध्यान, भजन, सेवा और सतसंग के माध्यम से परम धाम की ओर अग्रसर हो सकता है।
सुरत-शब्द-योग की अंतरमुखी साधना का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने समझाया कि जीवात्मा अपने मूल में परम आध्यात्मिक सत्ता का अंश है। संत सतगुरु की दया, मार्गदर्शन और शब्द-धुन के सहारे सुरत क्रमशः उच्चतर आध्यात्मिक मंडलों की ओर बढ़कर अपने निज घर और परम धाम तक पहुंच सकती है।
‘सार बचन’ में संकलित हुई पावन वाणी
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज की पावन वाणी और बचनों को बाद में ‘सार बचन राधास्वामी-छंद-बंद’ तथा ‘सार बचन राधास्वामी-वार्तिक’ के रूप में संकलित किया गया। इनमें जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप, संत सतगुरु की महिमा, नाम और शब्द की साधना, अंतरमुखी यात्रा तथा परम धाम की प्राप्ति का अत्यंत गूढ़ और अनुपम वर्णन मिलता है।
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज ने लगभग 17 वर्षों तक सार्वजनिक सतसंग की संभाल की। सतसंग की परंपरागत स्मृतियों के अनुसार उन्हें अपने निजधाम प्रस्थान के समय का पूर्ण बोध था। नश्वर चोला त्यागने से पूर्व उन्होंने संपूर्ण सतसंग और पूरी संगत को पूर्व रूप से अवगत कराया तथा आवश्यक आध्यात्मिक निर्देश प्रदान किए। संगत को यह भी संकेत दिया गया कि उनके बाद राय सालिगराम साहब बहादुर परम गुरु हुजूर महाराज सतसंग और संगत की संभाल करेंगे।
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज ने 15 जून 1878 को पन्नी गली स्थित अपने निवास पर नश्वर चोला त्यागकर निजधाम को प्रस्थान किया। सतसंग की दृष्टि में निजधार का कार्य इसके बाद भी समाप्त नहीं हुआ। उनकी दया, आध्यात्मिक शक्ति और निजधार परम गुरु हुजूर महाराज के पावन स्वरूप में प्रकट होकर संगत का मार्गदर्शन करती रही। गुरु-परंपरा में परम गुरु हुजूर महाराज को द्वितीय संत सतगुरु के रूप में स्वीकार किया जाता है।
इसके बाद परम गुरु हुजूर महाराज ने पूरी संगत को अपने प्रेम, दया और मार्गदर्शन में संभाला तथा राधास्वामी सतसंग की पावन धारा को व्यापक विस्तार प्रदान किया। इसके पश्चात परम गुरु महाराज साहब, परम गुरु सरकार साहब, परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज, परम गुरु हुजूर मेहताजी महाराज और परम गुरु हुजूर डा. एम. बी. लाल साहब के माध्यम से यही पावन गुरु-परंपरा अनवरत आगे बढ़ती रही।
वर्तमान वक्त संत सतगुरु हैं हुजूर प्रोफेसर प्रेम सरन सतसंगी साहब
दयालबाग की आध्यात्मिक मान्यता में परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज के स्वरूप में अवतरित राधास्वामी दयाल की निजधार विभिन्न पावन स्वरूपों में निरंतर कार्य कर रही है। यह विश्वास गुरु-परंपरा की अविच्छिन्न निरंतरता और वक्त संत सतगुरु के जीवंत मार्गदर्शन में प्रकट होता है।
आज इसी पावन गुरु-परंपरा में परम पूज्य हुजूर प्रोफेसर प्रेम सरन सतसंगी साहब राधास्वामी मत के अष्टम एवं वर्तमान वक्त संत सतगुरु के रूप में संगत के मध्य विराजमान हैं। उन्हें दयालबाग सतसंग के अष्टम संत सतगुरु के रूप में 18 मई 2003 को सर्वसम्मति से जयघोषित किया गया। दयालबाग की संगत स्वयं को परम धन्य और बड़भागी मानती है कि वर्तमान वक्त संत सतगुरु का साक्षात मार्गदर्शन, दया और संभाल उसे पल-पल और प्रतिपल प्राप्त हो रही है।
परम पूज्य हुजूर प्रोफेसर प्रेम सरन सतसंगी साहब का शैक्षणिक एवं वैज्ञानिक जीवन भी विशिष्ट रहा है। उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.एससी., मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी, यूएसए से एम.एस. तथा यूनिवर्सिटी आफ वाटरलू, कनाडा से सोशियो-इकोनॉमिक सिस्टम्स के क्षेत्र में पीएच.डी. प्राप्त की।
आईआईटी दिल्ली में शैक्षणिक एवं रिसर्च सेवाओं के पश्चात उन्होंने वर्ष 1994 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट में आनरेरी डायरेक्टर/वाइस-चांसलर के रूप में सेवा की। भारत में सिस्टम्स मूवमेंट के जनक के रूप में विख्यात परम पूज्य हुजूर प्रोफेसर सतसंगी साहब वर्तमान में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट की एडवाइजरी कमेटी ऑन एजुकेशन (एसीई) के चेयरमैन हैं। उनके मार्गदर्शन में सिस्टम्स साइंस, शिक्षा, पर्यावरण तथा कॉन्शसनेस स्टडीज सहित बहुविषयी रिसर्च और समाजोपयोगी कार्यों को निरंतर दिशा मिली है।
“बरस रही है दया आपकी, हम पर हर पल हे गुरु महाराज॥”
व्यक्तिगत जीवन, सामुदायिक उत्तरदायित्व, सेवा, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण, विज्ञान, कॉन्शसनेस स्टडीज अथवा किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में संगत को उनके पावन निर्देशन और दयालु सुझावों से निरंतर प्रेरणा एवं दिशा प्राप्त होती है।
1915 में रखी गई दयालबाग की नींव
परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज ने बसंत पंचमी के दिन वर्ष 1915 में दयालबाग की स्थापना एक आध्यात्मिक बस्ती के रूप में की थी। एक छोटे से पौधे के रूप में रोपा गया यह पावन संकल्प आज वक्त संत सतगुरु की दया और मार्गदर्शन में शिक्षा, सेवा, श्रम, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण, वैज्ञानिक चिंतन और सहकारी सामुदायिक जीवन का विशाल एवं फलदायी वृक्ष बन चुका है।
दयालबाग में आध्यात्मिक जीवन केवल सतसंग तक सीमित नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में श्रम, सेवा, अनुशासन, सादा जीवन, उच्च विचार, सामुदायिक सहयोग और मानव-मात्र की भलाई के रूप में प्रकट होता है। यहां सतसंगी भाई-बहन गृहस्थ जीवन के उत्तरदायित्वों को निभाते हुए सेवा और साधना को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और समाजोपयोगी संस्थाओं के माध्यम से दयालबाग ने आध्यात्मिकता तथा व्यावहारिक जीवन के समन्वय का विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।
देश-विदेश में निरंतर प्रवाहित हो रही आध्यात्मिक धारा
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज द्वारा प्रवाहित राधास्वामी सतसंग की पावन आध्यात्मिक धारा, जो 15 फरवरी 1861 को बसंत पंचमी के पावन दिवस पर आम जन के लिए खोली गई, तब से निरंतर एवं अविरल रूप से प्रवाहित होती चली आ रही है। दयालबाग राधास्वामी सतसंग सभा का मुख्यालय तथा राधास्वामी मत का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है।
इसके अतिरिक्त स्वामीबाग, हजूरी भवन-पीपल मंडी, राधास्वामी सतसंग ब्यास, दीनोद तथा अन्य स्वतंत्र सतसंग परंपराओं और केंद्रों से भी देश-विदेश में असंख्य अनुयायी जुड़े हुए हैं। इन सभी की अपनी-अपनी संगठनात्मक व्यवस्थाएं और गुरु-परंपराएं हैं। इनका उल्लेख यहां केवल व्यापक राधास्वामी आध्यात्मिक परंपरा की विश्वव्यापी उपस्थिति और परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज से जुड़े साझा ऐतिहासिक मूल को रेखांकित करने के लिए किया गया है, किसी संस्थागत तथ्य अथवा दावे के रूप में नहीं।
आज विश्वभर में असंख्य अनुयायी परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज द्वारा प्रदत्त प्रेम, सेवा, सदाचार, शुद्ध जीवन, मानव-एकता, सतसंग और अंतरमुखी साधना के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास कर रहे हैं। उनका संदेश किसी एक जाति, भाषा, वर्ग, क्षेत्र अथवा देश तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता को प्रेम, शांति, आत्मबोध और परमपिता से मिलाप का मार्ग प्रदान करता है।
4 सितंबर को आरती के बाद खेतों पर होगा पावन भंडारा
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को भंडारा दिवस पर प्रातःकाल आरती का पावन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। द्वितीय पाली में खेतों पर नियमानुसार परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज का पावन भंडारा मनाया जाएगा। 2 से 6 सितंबर तक चलने वाले भंडारा सप्ताह में दयालबाग और देश-विदेश की विभिन्न शाखाओं में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ आयोजन होंगे।
परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामीजी महाराज के पावन चरण कमलों में कोटि-कोटि प्रणाम।





















































