उत्तराखंड धर्म

सैकडो वर्ष पुरानी परंपरा के तहत पालकी के साथ आएंगे अविमुक्तेश्वरानन्द

हरिद्वार।
श्री ज्योतिषपीठ के असली—नकली के विवादों में घिरे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज मंगलवार को कनखल स्थित मठ में पहुंचे। जहां संतो और श्रद्धालुआे द्वारा उनका पुष्पवर्षा के साथ भव्य स्वागत किया गया।उन्होंनेे कहा कि ज्योतिष पीठ की पुरानी परंपरा को दोबारा से शुरू की जायेगी। भगवान बद्रीनाथ के कपाट बंद की सभी रस्मो को जो शंकराचार्य द्वारा किया जाना है वह सभी परंपराएं पूरी की जायेगी। परंपरा थी कि बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने पर शंकराचार्य पालकी के साथ ही आते थे। सैकड$ों साल पहले ज्योतिष पीठ में यह परंपरा बंद हो गई थी।

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बताया कि करीब 235 वर्ष पहले 1775 में शंकराचार्य कपाट बंद होने के बाद पालकी में बैठकर आते थे। आज दोबारा से ज्योतिष पीठ की इस परंपरा को शुरू किया जाएगा। वह स्वयं कपाट बंद होने के बाद पालकी के साथ—साथ आएंगे। अगले पांच माह के लिए कपाट बंद होने पर भगवान को माणा गांव की महिलाआें द्वारा बनाये गए कंबल को बद्री गायों के घी में भिगोकर ओढाया जाता है। उसके बाद पालकी रवाना होती है। शंकराचार्य का अखाड$ों द्वारा विरोध किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि केवल एक व्यक्ति का विरोध है अखाडो का विरोध नही है। एक व्यक्ति के विरोध को विरोध कैसे माना जाए। उनके मन में हमारे लिए कोई नाराजगी होगी या उनका कोई उद्देश्य होगा जिसके कारण वह विरोध कर रहे है। हमारा उनसे कोई द्वेष नही है। जब वह मिलेंगे हम उनसे पूछ लेंगे। उन्होंने कहा कि हम अखाडो का सम्मान करते हैं उनके अच्छे गुणों का सम्मान करते हैं। अखाडे हमारे ही हैं हम उनसे अलग नहीं है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ज्योतिष पीठ में यदि गिरि नामा गद्दी होनी चाहिए थी तो आदि काल से होनी चाहिए थी। बताया कि 1941 में बृहमानन्द सरस्वती उनके बाद कृष्णबोध आश्रम बीस वर्षो तक रहे। इनके बाद 48 वर्षो तक गुरू जी रहे। इनमे कोई आश्रम नामा तो कोई सरस्वती नामा रहे। अब अविमुक्तेश्वरानन्द के समय में यह बात उठाई गई है। येतो सिद्धांत की बात है गिरी, पर्वत, सागर सह तीन नाम है जो त्रिदण्डी स्वामी होते है जो शंकराचार्य होता है वह दण्डी स्वामी होते है। इस समय गिरि नामा कोई शंकराचार्य ही नही है। दण्डवाला गिरि सन्यासी तो इस समय भारत में कोई है ही नही। सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला कर दिया है कि केवल साढे तीन लोगों पर ही दण्ड है। साढे छह नाम पर दण्ड है ही नही। जब दण्ड वाला सन्यासी ही नही मिलेगा तो शंकराचार्य कैसे बना सकते है। गिरि नाम का दण्डी सन्यासी शंकराचार्य बनाने का कोई हक नही है। कहा कि केवल स्थापित शंकराचार्य को यह हक है कि वह किसे अध्यक्ष बनाता है। वह अपने शिष्य को दश नामो में से कौन सा नाम देता है। जब वह किसी गिरि नाम के सन्यासी को शंकराचार्य बना देगा तभी गिरि नामा शंकराचार्य बन सकता है। कहा कि उन्होंने यह बात ज्योतिषपीठ में आयेाजित सभा में भी कही थी। हमारे ज्योतिष पीठ में नाम है गिरि, पर्वत, सागर कोई एक नाम धारण कर ले। श्रंगेरी के शंकराचार्य ने भी यह व्यवस्था दी है कि यह नही हो सकता है । उन्होंने कहा कि ज्योतिषपीठ में ऐसा सैकडो वर्षाे बाद हुआ जब तीन शंकराचार्याे ने ज्योतिष पीठ में एक साथ किसी आयोजन में प्रतिभाग किया हो। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा ज्योतिष पीठ को उसके प्राचीन नाम की घोषणा किये जाने के लिए साधुवाद देते हुए जोलीग्रांट एयरपोर्ट का नाम जगद्गुरु शंकराचार्य के नाम पर किये जाने की अपनी पुरानी मांग को दोहराया है। कहा कि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा उत्तराखंड के लिए बहुत कुछ किया गया है। इसे देव भूमि बनाया है। उन्होंने कहा कि पूज्यपाद गुरू जी के अधूरे कार्यो को पूरा किया जाएगा। जिसमें एक दस हजार छात्रो की शिक्षा के लिए गुरूकुल का निर्माण किया जाना, सौ बिस्तरो के अस्पताल का निर्माण किया जाने के अलावा अन्य धर्म के अन्य कार्य किये जाने है। वही जब जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द महाराज का काफि ला मध्य हरिद्वार स्थित परशुराम चौक पहुंचा वहां भगवान परशुराम अखाडा के सदस्यों द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया। उल्लेखनीय है कि कुम्भमेला निर्माण कार्यो के दौरान भगवान परशुराम चौक का शिलान्यास स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द द्वारा ही किया गया था।

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