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एनआरएचएम (दवा) घोटाले की सीबीआई जांच की मांग को कैसे फ्रीज़ में लगाया, एक सीएम ने दी परमिशन दूसरे ने दबा दी

सूचना के अधिकार से हुआ खुलासा
हरिद्वार।
राष्ट्रीय सूचना अधिकार जागृति मिशन के अध्यक्ष एवं समाजिक कार्यकर्ता रमेश चंद शर्मा ने प्रवर्तन निदेशालय ईडी से 600 करोड़ के दवा घोटाला प्रकरण की सीबीआई जांच समाप्त करने के एवज में भ्रष्टाचार के आरोपियों को बचाने के लिए उनसे हवाला प्रक्रिया से ली गई रिश्वत के द्वारा किए गए मनी लॉन्ड्रिंग घोटाला की जांच कराने उपरांत दंडातामक कार्यवाही की निष्पक्ष मांग की।
अपीलकर्ता ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के कार्यकाल के दौरान 600 करोड़ रुपयों का दवा घोटाला हुआ था। सूचना अधिकार तहत सूचना आयुक्त ने वर्ष 2011 से लेकर 2013 तक 3 स्तर के महानिदेशक से दवा घोटाला की जांच कराई थी। जांच परिणाम के आधार पर सूचना आयुक्त ने 6 जनवरी 2014 को सीबीआई जांच कराने की संतुष्टि शासन को की थी। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 11 अप्रैल 2014 को तत्काल सीबीआई जांच कराने का लिखित आदेश शासन को दिया था। गृह2विभाग शासन ने सीबीआई जांच कराने की अधिसूचना  दिनाक 29 अप्रैल 2014को जारी की थी।  तत्कालीन सचिव गृह शासन मंजुल जोशी ने शासकीय पत्र द्वारा भारत सरकार कार्मिक मंत्रालय से सीबीआई जांच टीम गठित करने का अनुरोध किया था। सीबीआई शाखा देहरादून प्रभारी ने शासन के पत्र द्वारा निर्देश दिया था कि दवा घोटाला प्रकरण के खिलाफ FIR दर्ज कराए। वही अनुसचिव स्वास्थ्य चिकित्सा ने 600करोड़ रुपया के दवा घोटाला प्रकरण के घटना क्रम की लिखित रिपोर्ट 22/1/2015 द्वारा प्रेषित कराई थी।
सीबीआई शाखा देहरादून प्रमुख ने पत्र संख्या 7_8_2019 तथा 28/8/2019 एवम 26/9/2019 के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2018 की धारा 17ए तहत मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को प्रेषित करा कर एनएचआरएम दवा घोटाला मे सलिप्त समस्त दोषियों के खिलाफ जांच कराने की सहमति मांगी थी। शासन ने शासकीय पत्रावली में अनुमोदन प्रक्रिया लिख कर मुख्यमंत्री से उस पर स्वीकृति 27/2/2019 को मांगी थी। शासकीय पृष्ठ संख्या 67 पर मुख्यमंत्री ने सीबीआई जांच वापस कराने का आदेश दिया था।
शासकीय पृष्ठ संख्या 71 पर मुख्यमंत्री ने दिनांक 10/3/2020को स्वयं हस्ताक्षर से सीबीआई जांच निरस्त कर सतर्कता विभाग से 600करोड़ रुपये के दवा घोटाला की जांच कराने का आदेश दिया था। गृहविभाग शासन सचिव ने मुख्यमंत्री के निर्णय पर न्याय विभाग शासन का न्यायिक परामर्श 15 अप्रैल 2020 को मांगा था। न्याय प्रमुख सचिव ने सरकार को परामर्श दिया था कि भारत सरकार डीओपीटी विभाग ने दिनांक 18/7/2019 को अधिसूचना संख्या 228 को जारी करने से दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टेसावी लिसमेंट की शक्तियां आधिकारिक आवेशन हेतु संपूर्ण उत्तराखंड राज्य में जांच कराने के लिए विस्तारित Ex tend कर दी है। ऐसी स्थिति मे दवा घोटाला प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच किसी अन्य राजस्तरीय संगठन से कराना उचित प्रतीत नहीं होता है। टिप्पणी शासकीय पृष्ठ संख्या 73पर अंकित है। सचिव शासन ने महाधिवक्ता उच्च न्यायालय से भी दिनांक 30जून 2020 की सीबीआई जांच निरस्त कराने के लिए मुख्यमंत्री के निर्णय पर न्यायिक सलाह मांगी थी, उस पर शासकीय पृष्ठ संख्या 75पर महाधिवक्ता ने लिखित में परामर्श दिया था कि भारत सरकार की सीबीआई अधिसूचना को निरस्त कर अन्य राज्य स्तरीय संगठन से जांच कराने न्याय समस्त अधिकार मुख्यमंत्री को प्राप्त नहीं है। मुख्यमंत्री ने दवा घोटाला में संलिप्त स्वास्थ्य मंत्री दवा व्यापारियों अधिकारियों से रिश्वत में हवाला परक्रिया से लिए गए धन के दवाब प्रभाव में न्याय विभाग। महाधिवक्ता के दिए गए न्याय परमर्श के खिलाफ हट धर्मिता करते हुए शासकीय पृष्ठ संख्या 75 में पूर्व आदेशानुसार लिख कर सीबीआई जांच के अधिसूचना संख्या 1078/XX _1 दिनांक 29 अप्रैल 2014 समाप्त कर उसकी सूचना पत्र संख्या 507 द्वारा कार्मिक मंत्रालय भारत सरकार को भिजवाकर 600करोड़ रुपये का एनआरएचएम दवा घोटाला को जमीदोराज वर्ष 17 अगस्त2020 में जारी शासकीय आदेश संख्या 507 से करा दिया है।

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