उत्तराखंड का फील्ड मार्शल भी अपनो के बीच बेगानो सा…. कहां जा रही हमारी संस्कृति, संवेदना ..?
एक फील्ड मार्शल ऐसा भी
जो ताउम्र लड़ता रहा पहाड़ और पहाड़ियत के लिए
– नीयति का खेल, जीवन की सांध्यबेला में अब जंग लड़ रहा मौत से
इंद्रेश हास्पिटल का एचडीयू न्यूूरो आईसीयू वार्ड। वार्ड के बाहर मरीजों की तख्ती लगी है, उस पर दिवाकर नाम देख दिल में नश्तर सा चुभता है। बोर्ड पर लगी तख्ती मुह सा चिढ़ाती है दिवाकर के आगे कैश लिखा है। यानी दिवाकर भट्ट का इलाज कैश में हो रहा है। कोई इंश्योरेंस नहीं, कोई सरकारी इमदाद नहीं। आईसीयू में अंदर जाने की मनाही है। मोहित डिमरी हौले से दरवाजे खोल दूर से मुझे फील्ड मार्शल कहे जाने वाले दिवाकर भट्ट का बेड दिखाता है। देखता हूं अचेत और निस्तेज फील्ड मार्शल को। जिसने चुप रहना सीखा नहीं। जीवन में कैसे भी झंझावात आए हों, वह उनसे खूब टकराया। अपने ही अंदाज से। इस राज्य आंदोलनकारी की यह दशा देख मेरे मुह से आह निकल गयी। यही नीयति है। जीवन की सांध्यबेला है।
बाहर उनका पुत्र ललित मिलता है। मैंने पूछा, क्या कहा डाक्टर ने। ललित रुआंसा हो गया। आंखों की कोर डबडबा गयी तो मुंह फेर कर कुछ दूर गया। मैं समझ गया। एक बेटे का अपने पिता के प्रति अगाध प्रेम और चिन्ता। ललित की पत्नी कहती है, डाक्टर ने कहा, अब घर ले जाओ। बस, डिस्चार्ज की तैयारी है। पिछले 9 दिनों से खाना नहीं खाया है। फूड पाइप से लिक्विड दिया जा रहा है। कोई सुधार नहीं हो रहा। ललित के अनुसार उनके शरीर में सोडियम बहुत कम हो गया। वह रिस्पांड ही नहीं कर रहे हैं। इसलिए तय किया है कि कल डिस्चार्ज कर घर ले जाएंगे।
उत्तराखंड आंदोलन के प्रणेता और फील्ड मार्शल कहे जाने वाले दिवाकर भट्ट आज पितामह भीष्म की तर्ज पर सरशैय्या पर हैं। दिवस का अवसान सा हो रहा है। मैं उन्हें कई बार मिला। मै उन्हें हमेशा एक राजनीतिज्ञ के तौर पर नकारता रहा। उनसे मतभेद रहे है। मेरा मानना है कि यदि यूकेडी ने राष्ट्रीय दलों को समर्थन नहीं दिया होता तो संभवतः इस प्रदेश की इतनी दुर्दशा नहीं होती। मतभेद की बात अलग है, पर मन तो हम दोनों का एक सा है, पहाड़ के प्रति समर्पित। पहाड़ का बेटा, श्रीयंत्र टापू से लेकर लाल किले की प्राचीर तक तूफान उड़ाने वाला फील्ड मार्शल नीयति के आगे बेबस है।
मन में विचारों का ज्वार-भाटा सा फूट गया। हाय, ये क्या हो रहा है। सत्ता के एक नेता को यदि बुखार भी आता है तो उसे दिल्ली एम्स या गुड़गांव के मेदांता ले जाया जाता है। लेकिन सरकार ने राज्य आंदोलन को धार देने वाले और जिसकी बदौलत नेता सत्ता सुख भोग रहे हैं, उस नेता को बचाने की कोशिश नहीं की। उसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया है।
लेखक
वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला
————————————-–—————-















































